GANDHI

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MAHATMA

Wednesday, October 27, 2010

विफलता : शोध की मंज़िलें / जयप्रकाश नारायण


जीवन विफलताओं से भरा है,
सफलताएँ जब कभी आईं निकट,
दूर ठेला है उन्हें निज मार्ग से ।

तो क्या वह मूर्खता थी ?
नहीं ।

सफलता और विफलता की
परिभाषाएँ भिन्न हैं मेरी !

इतिहास से पूछो कि वर्षों पूर्व
बन नहीं सकता प्रधानमन्त्री क्या ?
किन्तु मुझ क्रान्ति-शोधक के लिए
कुछ अन्य ही पथ मान्य थे, उद्दिष्ट थे,
पथ त्याग के, सेवा के, निर्माण के,
पथ-संघर्ष के, सम्पूर्ण-क्रान्ति के ।

जग जिन्हें कहता विफलता
थीं शोध की वे मंज़िलें ।

मंजिलें वे अनगिनत हैं,
गन्तव्य भी अति दूर है,
रुकना नहीं मुझको कहीं
अवरुद्ध जितना मार्ग हो ।
निज कामना कुछ है नहीं
सब है समर्पित ईश को ।

तो, विफलताओं पर तुष्ट हूँ अपनी,
और यह विफल जीवन
शत–शत धन्य होगा,
यदि समानधर्मा प्रिय तरुणों का
कण्टकाकीर्ण मार्ग
यह कुछ सुगम बन जावे !

(९ अगस्त १९७५, चण्डीगढ़-कारावास में)

Friday, October 22, 2010

कांग्रेस का मानसिक रोग



कांग्रेस के मौजूदा नेता बच्चो कि तरह हरकते कर रहे है... ऐसा लग रहा है कि जैसे सब उस एक परिवार के गुलाम है और उसी का गुणगान करने मे लगे हैं जिनका उन्हे मेहनताना मिलता है. राहुल गाँधी कि तुलना जय प्रकाश नारायण से करना हमारे बलिदानो के साथ बहुत बड़ा मज़ाक है. राहुल ने अभी तक एक भी ऐसा उदाहरण पेश नही किया जिसकी बजाह से देश का आम आदमी उन पर गर्व महसूस करे. उन्हे अपना नेता बस कांग्रेस के चाटुकार लोग ही मानते है, आम जनता नही. जान जान का नेता बनने के लिए बलिदान वा समर्पण एक मात्र रास्ता है. ............राहुल को युवा नेतरत्व कि झलक कहने वाले नासमझ क्या भगत सिंह, गणेश शंकर , बिस्मिल असफ़ाक़ एवं उनके साथियो द्वारा किए कार्यो को क्या भूल गये.

क्षमा करो बापू! तुम हमको,
बचन भंग के हम अपराधी,
राजघाट को किया अपावन,
मंज़िल भूले, यात्रा आधी।

जयप्रकाश जी! रखो भरोसा,
टूटे सपनों को जोड़ेंगे।
चिताभस्म की चिंगारी से,
अन्धकार के गढ़ तोड़ेंगे।

Friday, October 15, 2010

रावण अमर है क्या ?


भारत आस्थाओ और कल्पनाओ का देश कब हो गया................असलियत से दूर....या पहले से ही था.............हमने दुनिया को सिखाया और खुद भूल बैठे. हमारा आत्मविश्वास कही खो गया...............बुराई पर सच्चाई कि जीत...........आज मेले तक सिमट कर रह गई है......रावण आज तक नही मरा.....रामलीला अपना मकसद खो बैठी.....राम बनाने का संकल्प टूट गया..................जितनी भीड़ रामलीला के मैदानो मे होती है...........अगर हम कभी देश कि सम्मस्याओ के लिए इस तत्परता से जुट सकते तो माहौल कुछ और ही होता.....लेकिन हमने सीखा केवल झूठी आस्थाओ मे जीना....हमे बताया गया कि ब्रह्म सत्या है और जगत मिथ्या है.........जिंदगी को जीना भुला दिया गया . ये रावण हर साल फिर जीवित हो जाता है.

Friday, October 1, 2010

धरती का लाल


इस हिन्दुस्तान मे ऐसे भी होम मिनिस्टर हुए जिनके पास पद तो था पर घर नही....... की आज के युवा इस हक़ीकत को मानेगे ...शायद नही.... लाल बहादुर शास्त्री उन कुछ नेताओ मे से है..... जिनकी ईमानदारी से राजनीति भी डरती है............... भारतिय सेना को पाकिस्तान मे घुस जाने का कठोर फ़ैसला लेने का दम...और शांति की स्थापना का संकल्प एक साथ....................विनम्र ही प्रथवी के वारिस होते है.............एक नही हज़ार किससे ईमानदारी और कर्तव्यनिष्टता के........बस किताबो के पन्ने पलटने है................उस आत्मा को शत शत नमन.

इतिहास की परिभाषा




अकसर लोग मुझसे पूछते है की आख़िर इतिहास क्या है................इतिहास की किताबो मे कई परिभाषाए मिल जाती है ...लेकिन बापू की तो बात हीअलग है.........परिभाषा भी दे दी और सारी समस्याओ का हाल भी.....................हिस्टरी मे दुनिया के कोलाहल की कहानी ..............मिलेगीराजा लोग कैसे खेलता थे....कैसे खून करते थे..... कैसे बैर रखते थे......ये सब हिस्टरी मे मिलता है..............जब प्रेम, और सत्या कीधारा रुकती है तब इतिहास मे लिखा जाता है. दो भाई लड़ते तो इतिहास बनता है अख़बार मे छपता है. अगर दो भाई प्रेम पूर्वक खुशहाल जिंदगी जीरहे हो तो इतिहास नही बनता. हिस्टरी अस्वाभाविक बातो को दर्ज करती है...........................

वकील और गाँधी



एक अजीब सा संशय बना हुआ है......लेकिन बादल छ्ट गये है........जिन गाँधी ने विदेश जाकर वकालत की पढ़ाई की....वो गाँधी वकीलो को हिन्दुस्तानं की दुर्दशा का कारण क्यो मान रहे है ? ..................सच भी है....वकालत पेशा नही धर्म है......एक वकील को अपने मुवक्किल की खातिर झूट बोलना पड़ता है. ........वकील का काम जजो के आयेज सच्ची बात रखना है..........सच की तह तक पहुचने मे मदद करना है...................अपराधी को निर्दोष करना उसका काम कभी नही है.

३० तारीख का फ़ैसला

जब देश के बड़े बड़े चैनल ३० तारीख को आम जनता से शांति बनाने की अपील कर रहे थे तो बार बार एक ही चेहरे का वास्ता जनता को दिया जा रहा थाऔर वो था राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का चेहरा............................बार बार ब्रेक मे एक ही भजन ......एश्वर अल्लाह तीरो नाम सबको सन्मति देभगवान ...........देर आए मगर दुरुस्त आए........गाँधी की याद पूरे देश को आई ........गाँधी के कहे अनुसार हिन्दुस्तान अगर प्रेम के सिद्धांत कोअपने धर्म के एक सक्रिय अंश मे स्वीकार करे और उसे अपनी राजनीति मे शामिल करे तो स्वराज्य स्वर्ग से धरती परउतरेगा...................................अभी भारत को ये समझना बाकी है.....मंदिर या मस्जिद की राजनीति से हमारे युवा बाहर निकलना चाहते है ......